"मंथन"
" मंथन" 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 शांत और स्वच्छ जल में अपने प्रतिबिंब को निहारती "ज्योत्सना "(चंद्रमा की किरणें) बड़े ही शांत भाव से अपनी आकृति पर मोहित हो रही थी कि अचानक कहीं से उस जल में एक पत्थर आ गिरा ।पत्थर के जल में गिरने से जल में उठने वाली वर्तुलाकार लहरों के कारण अब उसकी आकृति अस्पष्ट हो चुकी थी और साथ ही साथ उसका मोहभंग भी हो चुका था । मन ही मन विचारती वह ,वहां से थोड़ी दूर एक चट्टान पर जा बैठी ।कुछ सोचते हुए जब गहरे उतरी तो पाया कि ऐसा ही तो मानव मन है।उसी जल की भांति जिसमें आप केवल शांति के क्षणों में ही अपने अक्स को देख पाते हैं । मन में उठने वाले विचार उन लहरों की भांति ही तो हैं जो प्रतिबिंब को स्पष्ट होने ही नहीं देते । रात धीरे धीरे गहराती जा रही थी।ज्योत्सना भी अपने स्थान से उठ कर सहमे कदमों के साथ चल पड़ी। सहसा उसकी दृष्टि उस ओर गई जहां एक योगी साधनारत थे ।रात के अंधेरे में भी उनकी उपस्थिति से वह स्थान दैदीप्यमान हो रहा था ।उनका आभामंडल दिव्य था।मुख पर तेज,शांत भाव और कुछ मृदुल सी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर रही थी जैसे मानो क...