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"जागृति"

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तुम जब जागो तब देर नहीं , बस समझो यही सवेरा है  । सूरज की स्वर्णिम किरणों से, ज्यों भागा दूर अंधेरा है  । जीवन पथ पर चलते चलते, अवरोध बहुत से आयेंगे । मत रुकना तुम यूं घबराकर , वो सीख नई दे जायेंगे  । तपता है सोना अग्नि में, तब ही तो कुंदन बनता है । तपकर कुम्हार की मिट्टी का, यूं सुंदर रूप निखरता है । तुम मिट्टी भी ,सोना भी तुम, अपने अस्तित्व को पहचानो । मत मिलने दो,इस मिट्टी को मिट्टी में, कुंदन कर डालो  । कहते तो हैं सब बढ़े चलो, पर बढ़ना उसको आता है । नदियों समान निश्छल बनकर, जो सागर में मिल जाता है । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी" 🌹

"ऐसा भी कुछ किया जाए"

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क्यों ना फिर से , ऐसा भी कुछ किया जाए  ; रिश्तों के पैबन्दों को आज, दुबारा से सिया जाए । मिल बैठ उन बचपने से भरी  शामों को, गर्म चाय की चुस्की संग, एक बार फिर जिया जाए । बारिश में तैरती, कश्ती की डोर थामे ; एहसासों के समंदर को, एक बार तो पार किया जाए । क्यों ना फिर से ,ऐसा भी कुछ किया जाए ...... जात पात के सारे , झगड़ों को मिटाकर आज ; मानव को इंसान होने का, तमगा भी दिया जाए । धर्म के ठेकेदारों से ,धर्म को बचा करके ; सही रास्ते पर चलने का, मार्ग प्रशस्त किया जाए । नफरतों के चमन में ,प्यार के फूल खिलाकर ; आने वाली पीढ़ी को भी तो,तोहफे में कुछ दिया जाए । क्यों ना फिर से, ऐसा भी कुछ किया जाए ........ लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"

"साधना"

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गर उड़ना हो ऊंचाई पर, तो ध्यान " साधना" पड़ता है । जीवन में हर एक रिश्ते का, सम्मान " साधना"  पड़ता है । कभी  कभी मिलने वाला, अपमान " साधना"  पड़ता है । भूले भटके लोगों का तो, अज्ञान " साधना"  पड़ता है । अपने अनुजों की त्रुटियों का, परिणाम " साधना"  पड़ता है । पंचभूत इन तत्वों का भी, ज्ञान " साधना"  पड़ता है । त्रितापों के कारण का, संधान " साधना"  पड़ता है । गर उड़ना हो ऊंचाई पर, तो ध्यान  "साधना" पड़ता है ।   लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"

"प्रभु के नाम पाती"

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लिखने जब बैठूं तुमको तो, कलम ठिठक सी जाती है । जीवन का आधार तुम्हीं हो, हर पल यह समझाती है  । शब्दों में ना गढ़ पाएंगे ,  रूप तुम्हारा हे भगवन । भावों से ही काम चलाना ,भाव सदा तुझ पर अर्पण । पिया तुम्हीं ने विष का प्याला, सृष्टि की रक्षा हेतु । नीलकंठ तुम कहलाए, हे! महादेव जीवन सेतु । है अटूट विश्वास तुम्हीं पर, तुम ही पालन हारे हो । जीवन की दुरूह राहों से, तुम ही हमें निकाले हो । हे! गिरिजावर, हे! करुणाकर,सदा शरण अपनी रखना । देकर बुद्धि, विवेक, ज्ञान तुम, दुर्गुण से रक्षा करना । करते हम वंदन तुमको, तुम उसको स्वीकार करो । भूल चूक जो हुई हमारी, उसको तुम ना हृदय धरो । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"

"नींव के पत्थर"

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नींव के पत्थर को देखा है, किसी ने कब कहां  ? साध कर रखने की हो ताकत, वो इठलाते नहीं  । होते हैं गंभीर ,सागर सम, भले खारे सही .... नदियों को खुद में समाकर भी, वो बलखाते नहीं  । आसमानी रूह जिनकी, बरसती हो मेघ बन ; तप्त धरा के हृदय को, शांत कर जाती सदा  । खिलते हैं पुष्प और पल्लव, मन के आंगन में कहीं ; होते हैं सुरभित, सुसज्जित, जीवन के हर एक आयाम । क्या कोई है भूल सकता , उनके इस एहसान को ? जो कभी भी सामने आकर, उसको जताते नहीं  । उदार हृदय से भरे जो, शांत होते हैं सदा । जीवन के कोलाहलों में भी, विचलन वो दिखाते नहीं । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"

"आत्म चिंतन"

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बैठे जब कभी करीब अपने....... बड़ा सुकून मिला  । ना थी कोई आवाजाही, ना ही विचारों का उन्माद था  । थी बस नीरव सी स्तब्धता , और कुछ नीरव सा ही .... मधुर गान था  । करनी थीं कुछ बातें खुद से , पर कहां इसका भी कुछ भान था । बैठे जब कभी करीब अपने...... बड़ा सुकून मिला  । लेखिका _मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"