"मंथन"
"मंथन"
शांत और स्वच्छ जल में अपने प्रतिबिंब को निहारती "ज्योत्सना "(चंद्रमा की किरणें) बड़े ही शांत भाव से अपनी आकृति पर मोहित हो रही थी कि अचानक कहीं से उस जल में एक पत्थर आ गिरा ।पत्थर के जल में गिरने से जल में उठने वाली वर्तुलाकार लहरों के कारण अब उसकी आकृति अस्पष्ट हो चुकी थी और साथ ही साथ उसका मोहभंग भी हो चुका था ।
मन ही मन विचारती वह ,वहां से थोड़ी दूर एक चट्टान पर जा बैठी ।कुछ सोचते हुए जब गहरे उतरी तो पाया कि ऐसा ही तो मानव मन है।उसी जल की भांति जिसमें आप केवल शांति के क्षणों में ही अपने अक्स को देख पाते हैं ।
मन में उठने वाले विचार उन लहरों की भांति ही तो हैं जो प्रतिबिंब को स्पष्ट होने ही नहीं देते ।
रात धीरे धीरे गहराती जा रही थी।ज्योत्सना भी अपने स्थान से उठ कर सहमे कदमों के साथ चल पड़ी।
सहसा उसकी दृष्टि उस ओर गई जहां एक योगी साधनारत थे ।रात के अंधेरे में भी उनकी उपस्थिति से वह स्थान दैदीप्यमान हो रहा था ।उनका आभामंडल दिव्य था।मुख पर तेज,शांत भाव और कुछ मृदुल सी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर रही थी जैसे मानो कुछ कह रही हो ।
ज्योत्सना के नेत्र तो जैसे उनके मुखमंडल पर ही ठहर गए ।अब उसके मन के भाव बदल चुके थे ।शायद ये उन दिव्य विभूति के दर्शन का ही परिणाम था ऐसा उसने अनुभव किया ।
वह पल भर को भी वहां से हटना नहीं चाहती थी लेकिन उस घड़ी वहां से जाना ही उसकी नियति थी ।जैसे जैसे वह अपने कदम आगे बढ़ाती जा रही थी उसका मन शांत और शांत होता जा रहा था ।
जैसे कोई लहर (विचार)किसी सिद्ध पुरुष के मानस पटल पर उभरकर दूर तक उन संवेदनाओं की संवाहक हो प्रकृति के रोम रोम को तरंगित कर आनंदित और आलोकित कर जाती है।
लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"🙏
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