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"मां"

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मां बनकर ही जाना मैंने, कि मां क्या होती है  । दिल जब दुखता मेरा तो, वो क्यों रोती है  । हर सांझ सवेरे बच्चों की, किलकारी सुन कर ..... दिल ही दिल में वो, कितनी गदगद होती है  । बच्चों के सपनों को , साकार बनाने को ..... अपनी रातों की नींदों को, क्यों खोती है  ? मां बनकर ही जाना मैंने, कि मां क्या होती है  । हम क्या दे सकते तुझको मां, सब कुछ तो दिया तुम्हारा है । ये तन, ये मन , संस्कार तुम्हीं से, बीज तुम्हीं ने डाला है  । बस यही प्रार्थना हम सब की, तू सदा रहे प्रसन्न ओ मां...... मिले सदा आशीष तेरा, इसमें सौभाग्य हमारा है । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"