"जागृति"
तुम जब जागो तब देर नहीं ,
बस समझो यही सवेरा है ।
सूरज की स्वर्णिम किरणों से,
ज्यों भागा दूर अंधेरा है ।
जीवन पथ पर चलते चलते,
अवरोध बहुत से आयेंगे ।
मत रुकना तुम यूं घबराकर ,
वो सीख नई दे जायेंगे ।
तपता है सोना अग्नि में,
तब ही तो कुंदन बनता है ।
तपकर कुम्हार की मिट्टी का,
यूं सुंदर रूप निखरता है ।
तुम मिट्टी भी ,सोना भी तुम,
अपने अस्तित्व को पहचानो ।
मत मिलने दो,इस मिट्टी को मिट्टी में,
कुंदन कर डालो ।
कहते तो हैं सब बढ़े चलो,
पर बढ़ना उसको आता है ।
नदियों समान निश्छल बनकर,
जो सागर में मिल जाता है ।
लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी" 🌹
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