" मंथन" 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 शांत और स्वच्छ जल में अपने प्रतिबिंब को निहारती "ज्योत्सना "(चंद्रमा की किरणें) बड़े ही शांत भाव से अपनी आकृति पर मोहित हो रही थी कि अचानक कहीं से उस जल में एक पत्थर आ गिरा ।पत्थर के जल में गिरने से जल में उठने वाली वर्तुलाकार लहरों के कारण अब उसकी आकृति अस्पष्ट हो चुकी थी और साथ ही साथ उसका मोहभंग भी हो चुका था । मन ही मन विचारती वह ,वहां से थोड़ी दूर एक चट्टान पर जा बैठी ।कुछ सोचते हुए जब गहरे उतरी तो पाया कि ऐसा ही तो मानव मन है।उसी जल की भांति जिसमें आप केवल शांति के क्षणों में ही अपने अक्स को देख पाते हैं । मन में उठने वाले विचार उन लहरों की भांति ही तो हैं जो प्रतिबिंब को स्पष्ट होने ही नहीं देते । रात धीरे धीरे गहराती जा रही थी।ज्योत्सना भी अपने स्थान से उठ कर सहमे कदमों के साथ चल पड़ी। सहसा उसकी दृष्टि उस ओर गई जहां एक योगी साधनारत थे ।रात के अंधेरे में भी उनकी उपस्थिति से वह स्थान दैदीप्यमान हो रहा था ।उनका आभामंडल दिव्य था।मुख पर तेज,शांत भाव और कुछ मृदुल सी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर रही थी जैसे मानो क...
तुम जब जागो तब देर नहीं , बस समझो यही सवेरा है । सूरज की स्वर्णिम किरणों से, ज्यों भागा दूर अंधेरा है । जीवन पथ पर चलते चलते, अवरोध बहुत से आयेंगे । मत रुकना तुम यूं घबराकर , वो सीख नई दे जायेंगे । तपता है सोना अग्नि में, तब ही तो कुंदन बनता है । तपकर कुम्हार की मिट्टी का, यूं सुंदर रूप निखरता है । तुम मिट्टी भी ,सोना भी तुम, अपने अस्तित्व को पहचानो । मत मिलने दो,इस मिट्टी को मिट्टी में, कुंदन कर डालो । कहते तो हैं सब बढ़े चलो, पर बढ़ना उसको आता है । नदियों समान निश्छल बनकर, जो सागर में मिल जाता है । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी" 🌹
लिखने जब बैठूं तुमको तो, कलम ठिठक सी जाती है । जीवन का आधार तुम्हीं हो, हर पल यह समझाती है । शब्दों में ना गढ़ पाएंगे , रूप तुम्हारा हे भगवन । भावों से ही काम चलाना ,भाव सदा तुझ पर अर्पण । पिया तुम्हीं ने विष का प्याला, सृष्टि की रक्षा हेतु । नीलकंठ तुम कहलाए, हे! महादेव जीवन सेतु । है अटूट विश्वास तुम्हीं पर, तुम ही पालन हारे हो । जीवन की दुरूह राहों से, तुम ही हमें निकाले हो । हे! गिरिजावर, हे! करुणाकर,सदा शरण अपनी रखना । देकर बुद्धि, विवेक, ज्ञान तुम, दुर्गुण से रक्षा करना । करते हम वंदन तुमको, तुम उसको स्वीकार करो । भूल चूक जो हुई हमारी, उसको तुम ना हृदय धरो । लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"
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