"ऐसा भी कुछ किया जाए"
क्यों ना फिर से , ऐसा भी कुछ किया जाए ;
रिश्तों के पैबन्दों को आज, दुबारा से सिया जाए ।
मिल बैठ उन बचपने से भरी शामों को,
गर्म चाय की चुस्की संग, एक बार फिर जिया जाए ।
बारिश में तैरती, कश्ती की डोर थामे ;
एहसासों के समंदर को, एक बार तो पार किया जाए ।
क्यों ना फिर से ,ऐसा भी कुछ किया जाए ......
जात पात के सारे , झगड़ों को मिटाकर आज ;
मानव को इंसान होने का, तमगा भी दिया जाए ।
धर्म के ठेकेदारों से ,धर्म को बचा करके ;
सही रास्ते पर चलने का, मार्ग प्रशस्त किया जाए ।
नफरतों के चमन में ,प्यार के फूल खिलाकर ;
आने वाली पीढ़ी को भी तो,तोहफे में कुछ दिया जाए ।
क्यों ना फिर से, ऐसा भी कुछ किया जाए ........
लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"
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