"नींव के पत्थर"
नींव के पत्थर को देखा है,
किसी ने कब कहां ?
साध कर रखने की हो ताकत,
वो इठलाते नहीं ।
होते हैं गंभीर ,सागर सम,
भले खारे सही ....
नदियों को खुद में समाकर भी,
वो बलखाते नहीं ।
आसमानी रूह जिनकी,
बरसती हो मेघ बन ;
तप्त धरा के हृदय को,
शांत कर जाती सदा ।
खिलते हैं पुष्प और पल्लव,
मन के आंगन में कहीं ;
होते हैं सुरभित, सुसज्जित,
जीवन के हर एक आयाम ।
क्या कोई है भूल सकता ,
उनके इस एहसान को ?
जो कभी भी सामने आकर,
उसको जताते नहीं ।
उदार हृदय से भरे जो,
शांत होते हैं सदा ।
जीवन के कोलाहलों में भी,
विचलन वो दिखाते नहीं ।
लेखिका_मीनाक्षी शर्मा "मनस्वी"
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